देवीधुरा में गूंजा बग्वाल का रण, आठ मिनट तक बरसे पत्थर; 180 बग्वाली वीर घायल, चार रेफर
50 हजार से अधिक श्रद्धालु बने ऐतिहासिक बग्वाल के साक्षी, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी देखा रोमांचक पाषाण युद्ध
देवीधुरा/चंपावत। चंपावत जिले के देवीधुरा स्थित मां वाराही धाम में रक्षाबंधन के पावन पर्व पर शुक्रवार को सदियों पुरानी ऐतिहासिक बग्वाल की परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी। खोलीखाण दुबाचौड़ मैदान में चार खाम और सात थोकों के बग्वाली वीर आमने-सामने आए तो पूरा क्षेत्र मां वाराही के जयकारों से गूंज उठा। करीब आठ मिनट तक चले इस अनूठे पाषाण युद्ध के दौरान 180 बग्वाली वीर घायल हुए। घायलों का मौके पर बनाए गए स्वास्थ्य शिविरों में उपचार किया गया, जबकि चार घायलों को बेहतर उपचार के लिए जिला अस्पताल रेफर किया गया।
दोपहर करीब 1:48 बजे शुरू हुई बग्वाल 1:55 बजे तक चली। शंखनाद और धार्मिक अनुष्ठानों के बाद चार खामों के बग्वाली वीर पारंपरिक वेशभूषा और बांस-रिंगाल से बनी ढालों के साथ मैदान में उतरे। इसके बाद जयकारों के बीच एक-दूसरे की ओर पत्थर बरसाने का सिलसिला शुरू हुआ।
50 हजार से अधिक लोगों ने देखा अद्भुत नजारा
देवीधुरा की ऐतिहासिक बग्वाल को देखने के लिए इस बार भारी भीड़ उमड़ी। अनुमान के मुताबिक 50 हजार से अधिक श्रद्धालु और दर्शक इस परंपरा के गवाह बने। मैदान में जगह कम पड़ने पर बड़ी संख्या में लोगों ने आसपास के घरों की छतों और बाजार क्षेत्र से बग्वाल का नजारा देखा। भारी भीड़ के चलते आसपास के मार्गों और पार्किंग स्थलों पर भी दबाव देखने को मिला।
सीएम धामी भी बने बग्वाल के साक्षी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी देवीधुरा पहुंचे और मां वाराही की पूजा-अर्चना कर प्रदेशवासियों की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की। इसके बाद उन्होंने चार खामों और सात थोकों के बीच होने वाली ऐतिहासिक बग्वाल को देखा।
मुख्यमंत्री ने देवीधुरा की बग्वाल को उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, आस्था और सामुदायिक सहभागिता का अद्भुत प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि बग्वाल केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और एकता का भी संदेश देती है। बग्वाल के बाद सभी पक्षों के लोग एक-दूसरे से गले मिलकर सौहार्द का परिचय देते हैं।
पिछले वर्ष भी आठ मिनट चली थी बग्वाल
इस वर्ष की बग्वाल की अवधि करीब आठ मिनट रही। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पिछले वर्ष भी देवीधुरा में बग्वाल करीब आठ मिनट चली थी। इस लिहाज से इस बार भी परंपरागत बग्वाल लगभग उतनी ही अवधि तक चली।
मां वाराही धाम की सबसे बड़ी रहस्यमयी मान्यता
देवीधुरा स्थित मां वाराही धाम की अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताएं हैं। मंदिर परिसर में मां वाराही की पूजा अत्यंत प्राचीन परंपराओं के अनुसार की जाती है और गर्भगृह गुफा में देवी के दर्शन की परंपरा बताई जाती है। मंदिर की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां वाराही को देवी के शक्तिशाली स्वरूप के रूप में पूजा जाता है।
स्थानीय आस्था और परंपरा में मां वाराही के स्वरूप को लेकर कई रहस्यमयी मान्यताएं भी प्रचलित हैं। यही कारण है कि देवीधुरा केवल बग्वाल के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं और रहस्यमय आस्था के कारण भी देशभर में आकर्षण का केंद्र है।
परंपरा के साथ बदलता स्वरूप
देवीधुरा की बग्वाल को सदियों पुरानी परंपरा माना जाता है। समय के साथ इसे सुरक्षित बनाने के लिए कई बदलाव किए गए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 2013 में हाईकोर्ट के निर्देश के बाद बग्वाल में पत्थरों के स्थान पर फूलों के इस्तेमाल की व्यवस्था की गई थी, हालांकि इस दौरान पत्थर भी बरसते रहे हैं।
बग्वाल के समापन के बाद चारों खामों के लोग आपस में गले मिलते हैं। इस तरह कुछ ही मिनटों पहले मैदान में दिखाई देने वाला रोमांचक मुकाबला अंततः भाईचारे और सामाजिक एकता के संदेश में बदल जाता है।
देवीधुरा की बग्वाल इसलिए केवल एक मेला नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा, साहस और सामाजिक एकता की ऐसी जीवंत विरासत है, जिसकी गूंज हर वर्ष पूरे उत्तराखंड में सुनाई देती है।

