उत्तराखंड में राइस मिलर्स का बड़ा फैसला: ₹500 करोड़ के बकाए और मंडी शुल्क विवाद पर सरकारी अनुबंध का बहिष्कार

उत्तराखंड के राइस मिल उद्योग पर गहराते आर्थिक संकट के बीच ‘उत्तराखंड राइस मिल एसोसिएशन’ ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। एक निजी होटल में आयोजित राज्य स्तरीय कार्यकारिणी बैठक के दौरान मिलर्स ने अपनी लंबित समस्याओं को लेकर एकजुटता दिखाई और सर्वसम्मति से बड़ा कदम उठाने का फैसला लिया।

प्रमुख माँगें और मुद्दे:

  • लंबित भुगतान का तुरंत निपटारा: वर्ष 2019 से 2025 तक का लगभग ₹500 करोड़ का बकाया तुरंत जारी किया जाए।
  • चावल निस्तारण और भुगतान की समयसीमा: वर्ष 2025-26 के लगभग 6 लाख क्विंटल बचे हुए चावल की उतराई/निस्तारण और उसकी बकाया राशि के भुगतान के लिए स्पष्ट तारीख तय हो।
  • मंडी शुल्क का आर्थिक बोझ ख़त्म हो: वर्ष 2026-27 के लिए मंडी शुल्क का भुगतान राज्य सरकार स्वयं करे। मिलर्स पिछले 3 वर्षों से 2.5% की दर से मंडी शुल्क चुका रहे हैं, जबकि उन्हें केवल 2% का ही पुनर्भुगतान मिल रहा है। इस अतिरिक्त 0.5% के आर्थिक नुकसान का तत्काल समाधान निकाला जाए।

बहिष्कार का सख्त फैसला:

​एसोसिएशन ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया है कि जब तक इन तीन मुख्य माँगों का स्थायी समाधान नहीं होता, तब तक प्रदेश का कोई भी राइस मिलर आगामी पेराई/धान सत्र के लिए सरकार के साथ कोई अनुबंध (Contract) नहीं करेगा। पदाधिकारियों का कहना है कि यह निर्णय उद्योग के सम्मान, अस्तित्व और आर्थिक सुरक्षा को बचाने के लिए सामूहिक रूप से लिया गया है।

बैठक में मौजूद प्रमुख चेहरे:

​इस महत्वपूर्ण बैठक में एसोसिएशन के अध्यक्ष सत्यवान गर्ग, महामंत्री गगन गर्ग, उपाध्यक्ष जितेन्द्र सिंघल व हनी अरोड़ा, कोषाध्यक्ष विकास छाबड़ा, मंत्री रजत अरोड़ा, पूर्व अध्यक्ष सचिन गोयल के अलावा शिवकुमार मित्तल, नरेश कंसल, रोहताश अग्रवाल, अनिल नारंग, पंकज बंगा, हिमांशु अरोड़ा, संजय गोयल, ईश्वर बंसल, सौरभ सिंघल, अमित जिंदल, राजेन्द्र गुप्ता, हरप्रीत सिंह समेत प्रदेशभर के राइस मिलर्स मौजूद रहे।