कंडारी के छात्र बने जल संरक्षण के प्रहरी, परंपरागत जल स्रोत को दी नई जिंदगी
कंडारी/उत्तरकाशी। उत्तरकाशी जिले के कंडारी गांव के राजकीय इंटर कॉलेज के छात्र-छात्राओं ने जल संरक्षण की दिशा में मिसाल पेश की है। उन्होंने वर्षों से उपेक्षित पड़ी गाडा-धारा (पारंपरिक जल स्रोत) को साफ-सफाई और मरम्मत कर फिर से बहता पानी लौटा दिया। यह धारा अब गांव के लिए सिर्फ पानी का साधन ही नहीं, बल्कि परंपरा और प्रकृति को जोड़ने का प्रतीक बन गई है।

सहयोग की प्रेरक मिसाल:
इस कार्य में गांव के व्यवसायी सुभाष गौड़ (मुंबई निवासी) ने अहम भूमिका निभाई। उन्होंने अपने माता-पिता—कमला देवी और बालक राम गौड़—की स्मृति को समर्पित करते हुए धारा के संरक्षण और वृक्षारोपण में सहयोग दिया। उनके अनुसार, पेड़ लगाना और जल स्रोत बचाना ही माता-पिता को सच्ची श्रद्धांजलि है।
शिक्षक का मार्गदर्शन और बच्चों का उत्साह:
कार्यक्रम की संयोजक अध्यापिका सुरक्षा रावत ने बच्चों को जल संरक्षण का महत्व समझाते हुए कहा—“जल है तो कल है।” वे पहले भी “कल के लिए जल अभियान” और “बीज बम अभियान” जैसे प्रयासों से बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करती रही हैं। उनका उद्देश्य है कि आस-पास के गांव भी इस तरह की गतिविधियों से प्रेरित होकर अपने परंपरागत जलस्रोतों का संरक्षण करें और उन्हें सुंदर भी बनाएं।
छात्रों की जिम्मेदारी का प्रमाण:
मानसी, रिया, आरुषी, श्वेता, खुशी, नव्या चौहान, वेदांश, अंशुमन, सिद्धार्थ, प्रिंस, ऋषभ, अजय और विजय सहित कई बच्चों ने मिलकर यह दिखा दिया कि सामूहिक प्रयास से बदलाव लाना संभव है।
मुख्य संदेश:
कंडारी गांव की यह पहल बताती है कि पुरानी धाराओं और जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना केवल परंपरा को बचाना ही नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करना भी है। वास्तव में, “जल ही जीवन है, और इसे बचाना हर किसी की जिम्मेदारी है।”

