शिक्षा के साथ संस्कारों की पाठशाला: सोशल बलूनी पब्लिक स्कूल ने पेश की गुरु-शिष्य परंपरा की मिसाल
देहरादून। आधुनिक दौर में जहाँ शिक्षा का अर्थ केवल किताबी ज्ञान और करियर तक सीमित होता जा रहा है, वहीं देहरादून का सोशल बलूनी पब्लिक स्कूल विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों और सामाजिक संबंधों की जड़ें मजबूत करने का सराहनीय कार्य कर रहा है। विद्यालय का मानना है कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और संस्कारी समाज का निर्माण करना है।
विवाह समारोह में उमड़ा शिष्यों का स्नेह
हाल ही में विद्यालय के कंप्यूटर शिक्षक प्रशांत रौतेला के विवाह उपलक्ष्य में आयोजित रिसेप्शन पार्टी में गुरु-शिष्य परंपरा का एक भावुक और सुंदर दृश्य देखने को मिला। आईएसबीटी के समीप स्थित प्रशांति गार्डन में आयोजित इस समारोह में शिक्षक प्रशांत ने अपनी प्रिय शिष्या, कक्षा 8 की छात्रा अस्मिता घिल्डियाल को आमंत्रित किया था।

शिक्षक के प्रति इसी सम्मान और स्नेह को व्यक्त करने के लिए अस्मिता अपने बड़े भाई समर्थ घिल्डियाल (कक्षा 12, सोशल बलूनी स्कूल) के साथ समारोह में पहुँचीं। दोनों भाई-बहनों ने मंच पर जाकर नवविवाहित जोड़े को गुलदस्ता भेंट किया और अपने गुरु का आशीर्वाद लिया। बच्चों के इस निश्छल प्रेम और शिष्टाचार को देखकर वहां मौजूद सभी अतिथि दंग रह गए और विद्यालय द्वारा दिए जा रहे संस्कारों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की।
संस्कारों से ही सँवरता है भविष्य
इस अवसर पर छात्रा के पिता और शिक्षा विभाग के सहायक निदेशक डॉ. चंडी प्रसाद घिल्डियाल ने कहा:
“जब बिटिया ने अपने गुरुजी के विवाह में जाने की इच्छा जताई, तो मैंने सहर्ष अनुमति दी। बचपन में बोए गए संस्कारों के बीज ही भविष्य में वटवृक्ष बनते हैं। बच्चों के मन में शिक्षकों के प्रति यह आदर भाव पैदा करने में विद्यालय के मैनेजिंग डायरेक्टर विपिन बलूनी का मार्गदर्शन प्रशंसनीय है।”
- सोशल बलूनी पब्लिक स्कूल केवल किताबी कीड़ा बनाने के बजाय ‘सम्पूर्ण मानव’ बनाने पर केंद्रित है।
- शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच का अटूट रिश्ता समाज के लिए एक प्रेरणा है।
- गुरु-शिष्य की यह प्राचीन भारतीय परंपरा आज के दौर में भी प्रासंगिक है।

