इंकलाब जिंदाबाद!! 23 मार्च 1931 – वह दिन जब ‘इंक़लाब’ के नारों से कांप उठी थी अंग्रेजी हुकूमत
नई दिल्ली/लाहौर। आज 23 मार्च है। भारत के इतिहास का वह पन्ना, जो स्याही से नहीं बल्कि देश के महान सपूतों के रक्त से लिखा गया है। आज से ठीक 95 साल पहले, साल 1931 में आज ही के दिन शाम 7 बजकर 33 मिनट पर लाहौर सेंट्रल जेल में ‘शहीद-ए-आजम’ सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था।
मौत को गले लगाने की वो जादुई मुस्कान
जेल के रिकॉर्ड बताते हैं कि फांसी के तख्ते की ओर बढ़ते हुए भगत सिंह के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उनके हाथ में लेनिन की जीवनी थी और जुबां पर ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ का नारा। जेलर ने जब उनसे आखिरी इच्छा पूछी, तो उन्होंने बस इतना कहा— “मैं मरकर भी देशवासियों के दिलों में ज़िंदा रहना चाहता हूँ।”
अंग्रेज इतने खौफ में थे कि फांसी का समय अगले दिन सुबह तय होने के बावजूद, जनाक्रोश के डर से उन्हें 11 घंटे पहले ही चुपके से फांसी दे दी गई।
भगत सिंह: सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं, एक विचार
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के बंगा (अब पाकिस्तान) में हुआ था। जलियांवाला बाग हत्याकांड ने 12 साल के मासूम बालक के मन में क्रांति का जो बीज बोया, उसने आगे चलकर ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ों को हिला दिया।
- 8 अप्रैल 1929 को बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर उन्होंने सेंट्रल असेंबली में बम फेंका। उनका मकसद किसी की जान लेना नहीं, बल्कि “बहरों को सुनाना” था।
- जेल में रहते हुए उन्होंने ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ (Why I am an Atheist) जैसा कालजयी लेख लिखा, जो उनकी बौद्धिक क्षमता और तार्किक सोच का प्रमाण है।
वो नारे जिन्होंने इतिहास रच दिया
- इंक़लाब ज़िंदाबाद! (यह नारा भगत सिंह की पहचान बन गया)
- साम्राज्यवाद का नाश हो!
- बहरों को सुनाने के लिए धमाके की ज़रूरत होती है।
आज के युवाओं के लिए संदेश
आज के दौर में जब हम आज़ादी की खुली हवा में सांस ले रहे हैं, तो भगत सिंह की शहादत हमें याद दिलाती है कि यह स्वतंत्रता कितनी अनमोल है। उन्होंने कहा था— “व्यक्तियों को कुचलकर वे विचारों को नहीं मार सकते।” आज भगत सिंह एक व्यक्ति नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ का नाम है।
अमर उजियारा की ओर से शहीद-ए-आजम और उनके साथियों को शत-शत नमन।

