अल्मोड़ा: महापुरुषों के प्रति सरकारी तंत्र की बेरुखी, जयंती पर दोपहर तक उपेक्षित रही पंडित हरगोविंद पंत की प्रतिमा!

अल्मोड़ा। उत्तराखंड के निर्माण और समाज को नई दिशा देने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद एवं प्रखर समाज सुधारक पंडित हरगोविंद पंत की जयंती पर मंगलवार, 19 मई को जिला मुख्यालय में प्रशासनिक बेरुखी का एक बेहद निराशाजनक उदाहरण देखने को मिला। विडंबना देखिए कि जिस महान विभूति के नाम पर अल्मोड़ा का पूरा जिला चिकित्सालय संचालित होता है, उन्हीं की प्रतिमा मंगलवार सुबह से दोपहर तक बिना माल्यार्पण के सूनी खड़ी रही। न तो जिला प्रशासन का कोई नुमाइंदा वहां पहुंचा और न ही अस्पताल प्रबंधन को अपने मार्गदर्शक को याद करने की फुरसत मिली।

हैरानी और अफसोस की बात यह भी रही कि हर सार्वजनिक और सामाजिक मंच पर बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने वाले उनके पारिवारिक सदस्यों ने भी इस बार कार्यक्रम से दूरी बनाए रखी। व्यवस्था और अपनों की इस बेरुखी को देखकर स्थानीय जनता और सामाजिक कार्यकर्ताओं में गहरा आक्रोश और निराशा साफ देखने को मिली। स्थानीय लोगों का कहना था कि जिन्होंने अपना सर्वस्व देश और समाज को सौंप दिया, आज का सिस्टम उन्हें एक अदद माला अर्पित करना भी जरूरी नहीं समझता।

जब समाजसेवियों ने संभाली कमान

सुबह से उपेक्षित पड़ी प्रतिमा की सुध जब सिस्टम ने नहीं ली, तो दोपहर बाद अल्मोड़ा इंटर कॉलेज के प्रबंधक और वरिष्ठ शिक्षाविद सुशील कुमार जोशी खुद माला लेकर जिला अस्पताल परिसर पहुंचे। उनके इस सराहनीय प्रयास और आग्रह के बाद अस्पताल के स्टाफ की नींद टूटी और पंडित हरगोविंद पंत की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर औपचारिकता पूरी की गई। इस मौके पर उनके साथ मनमोहन बोरा, सुरक्षा अधिकारी हरीश सिंह बिष्ट और सामाजिक कार्यकर्ता संजय पाण्डे भी मौजूद रहे, जिन्होंने इस महान आत्मा को नमन किया।

पहले भी आ चुके हैं ऐसे मामले, महापुरुषों की उपेक्षा नई नहीं

जागरूक नागरिकों का कहना है कि अल्मोड़ा में स्वतंत्रता संग्राम के नायकों की अनदेखी का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य महकमा महान स्वतंत्रता सेनानी विक्टर मोहन जोशी की जयंती को पूरी तरह भूल चुका था। उस वक्त भी शिक्षाविद सुशील कुमार जोशी ने ही आगे आकर उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया था और व्यवस्था को उसकी जिम्मेदारी का अहसास कराया था।

कुरीतियों के खिलाफ लड़ी थी लंबी लड़ाई

पंडित हरगोविंद पंत का जन्म 19 मई 1885 को अल्मोड़ा के ऐतिहासिक चितई गांव में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वकालत की डिग्री ली, लेकिन उनका उद्देश्य धन कमाना नहीं बल्कि समाज सेवा था। उन्होंने “सोशल सर्विस लीग” की स्थापना कर उत्तराखंड में शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और जनजागरण की अलख जगाई। स्वतंत्रता आंदोलन में अग्रिम पंक्ति में रहने के साथ-साथ उन्होंने पहाड़ से छुआछूत, अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष किया।

आज भले ही देश और प्रदेश पंडित हरगोविंद पंत के दिखाए जनकल्याण और राष्ट्रभक्ति के रास्ते पर आगे बढ़ने का दावा करता हो, लेकिन सरकारी तंत्र की ऐसी लापरवाही और संवेदनहीनता कहीं न कहीं इन दावों की पोल खोलती है और कई गंभीर सवाल खड़े करती है।