भारतीय मुद्रा बाजार में भारी उथल-पुथल: डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंचा रुपया, निवेशकों में मची अफरा-तफरी

देहरादून/नई दिल्ली। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच सोमवार को भारतीय मुद्रा बाजार में जबरदस्त कोहराम देखने को मिला। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) की भारी बिकवाली और कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल के कारण भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 95.00 (सांकेतिक) के करीब पहुंच गया। बाजार में मची इस अफरा-तफरी ने न केवल आयातकों की चिंता बढ़ा दी है, बल्कि आम आदमी की जेब पर भी महंगाई की मार पड़ने की आशंका गहरा गई है।

रुपये की गिरावट के मुख्य कारण:

  1. भू-राजनीतिक तनाव: मध्य पूर्व (West Asia) में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक निवेशकों ने उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर और सोने की ओर रुख किया है।
  2. कच्चे तेल में उबाल: भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने से डॉलर की मांग में भारी इजाफा हुआ, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ गया।
  3. विदेशी फंडों की निकासी: मार्च के इस महीने में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजारों से रिकॉर्ड निकासी की है, जिससे मुद्रा बाजार में नकदी का संतुलन बिगड़ गया।

बाजार का हाल:

कारोबार की शुरुआत से ही बाजार में घबराहट का माहौल था। एक समय ऐसा आया जब रुपये की तेजी से गिरती कीमत को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को हस्तक्षेप करना पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो आने वाले दिनों में आयात महंगा होने से इलेक्ट्रॉनिक्स, ईंधन और खाद्य तेलों की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है।

उत्तराखंड के निर्यातकों पर भी असर:

मुद्रा बाजार में आए इस भूचाल का असर उत्तराखंड के औद्योगिक क्षेत्रों, विशेषकर सिडकुल (SIDCUL) में स्थित निर्यात इकाइयों पर भी पड़ रहा है। जहाँ एक ओर डॉलर महंगा होने से निर्यातकों को फायदा होने की उम्मीद है, वहीं कच्चे माल (Raw material) के आयात की लागत बढ़ने से उत्पादन खर्च में भी भारी वृद्धि देखी जा रही है।

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, “यह एक अभूतपूर्व स्थिति है। डॉलर की मजबूती और कच्चे तेल के झटके ने रुपये की कमर तोड़ दी है। जब तक वैश्विक स्थिति सामान्य नहीं होती, मुद्रा बाजार में यह अस्थिरता बनी रहने की संभावना है।”